आजीविका मिशन से जूता-चप्पल व्यवसाय शुरू करने वाली ललिता बाई
मजदूरी से दुकानदारी तक… ललिता बनीं ‘लखपति दीदी’, जूता-चप्पल के कारोबार से सालाना 1.50 लाख तक आय
धार, 1 अक्टूबर 2026। सेवा संकल्प अभियान के तहत ‘कहानी बदलाव की’ में सरदारपुर विकासखंड के ग्राम अमोदिया निवासी ललिता बाई की सफलता की कहानी सामने आई है। कभी परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए मजदूरी करने वाली ललिता आज अपना जूता-चप्पल का व्यवसाय संचालित कर रही हैं।
मध्यप्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ने के बाद ललिता ने स्व-सहायता समूह के माध्यम से बचत और ऋण की सुविधा का लाभ उठाया। मेहनत और आत्मविश्वास के साथ उन्होंने अपना व्यवसाय शुरू किया और अब प्रतिमाह लगभग 12 से 15 हजार रुपये तथा सालाना करीब 1.30 से 1.50 लाख रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं।
स्व-सहायता समूह से शुरू हुआ बदलाव
ललिता को आजीविका मिशन के समूह प्रेरक के माध्यम से स्व-सहायता समूह के गठन, संचालन और उससे मिलने वाले लाभों की जानकारी मिली। इसके बाद वर्ष 2020 में वे गांव के नव शक्ति आजीविका स्व-सहायता समूह से जुड़ीं।
समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने नियमित रूप से छोटी-छोटी बचत करना शुरू किया। समूह के साथ जुड़ने से उनके भीतर आत्मनिर्भर बनने का विश्वास भी मजबूत हुआ।
50 हजार रुपये के ऋण से शुरू किया व्यवसाय
वर्ष 2021 में ललिता ने समूह से 50 हजार रुपये का ऋण लिया। इस राशि से उन्होंने गांव में जूता-चप्पल की दुकान शुरू करने का निर्णय लिया।
छोटे स्तर से शुरू हुआ यह व्यवसाय धीरे-धीरे उनकी आय का महत्वपूर्ण साधन बन गया। व्यवसाय के साथ उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने की दिशा में भी लगातार प्रयास जारी रखा।
1.75 लाख रुपये के ऋण से बढ़ाया कारोबार
व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए ललिता ने वर्ष 2025 में सखी स्वावलंबन योजना के अंतर्गत मध्य प्रदेश ग्रामीण बैंक की धुलेट शाखा से 1 लाख 75 हजार रुपये का ऋण लिया।
इस राशि से उन्होंने अपनी जूता-चप्पल की दुकान को अधिक व्यवस्थित तरीके से संचालित करना शुरू किया। कारोबार बढ़ने के साथ उनकी मासिक आय में भी वृद्धि हुई।
ललिता दुकान चलाने के साथ खाली समय में सिलाई का काम भी करती हैं। इससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी होती है। वर्तमान में उनकी मासिक आय लगभग 12 से 15 हजार रुपये और वार्षिक आय करीब 1.30 से 1.50 लाख रुपये तक है।
साहूकारों के कर्ज से मिली राहत
आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ ललिता अब अपने बैंक ऋण की किश्तें समय पर जमा कर रही हैं। उनके परिवार को साहूकारों के कर्ज से भी मुक्ति मिली है।
अब वे अपने बच्चों की शिक्षा पर पहले से अधिक ध्यान दे पा रही हैं। ललिता अपने दो पुत्रों और एक पुत्री को बेहतर शिक्षा और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रयासरत हैं।
मजदूरी से खुद के व्यवसाय तक का सफर
आजीविका मिशन से जुड़ने से पहले ललिता के परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। परिवार में पति, दो पुत्र, एक पुत्री और स्वयं सहित पांच सदस्य हैं।
उनके पति खेती का काम करते थे, जबकि ललिता मजदूरी करके परिवार के भरण-पोषण में सहयोग करती थीं। सीमित आय के कारण बच्चों की पढ़ाई और परिवार की अन्य जरूरतों को पूरा करना चुनौतीपूर्ण था।
खेती और घरेलू जरूरतों के लिए कई बार उन्हें दूसरों से ब्याज पर रुपये लेने पड़ते थे। आय का एक हिस्सा कर्ज का ब्याज चुकाने में चला जाता था। ऐसे समय में स्व-सहायता समूह से जुड़ना उनके लिए आर्थिक बदलाव की नई शुरुआत बना।
समूह ने दिया आत्मनिर्भर बनने का विश्वास
ललिता अपनी सफलता का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को देते हुए आभार व्यक्त करती हैं। उनका कहना है कि समूह से जुड़ने के बाद उन्हें आर्थिक सहायता के साथ स्वयं का व्यवसाय शुरू करने और अपने पैरों पर खड़े होने का आत्मविश्वास मिला।
आज ललिता की सफलता समूह की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बनी है। उनके आत्मविश्वास और मेहनत से प्रेरित होकर समूह की अन्य महिलाएं भी आर्थिक गतिविधियों से जुड़कर ‘लखपति दीदी’ बनने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
रिपोर्टिंग: आनंद अग्निहोत्री





































































































