पेयजल संरक्षण और भूजल स्तर सुधार हेतु अनुकरणीय पहल: जनसहयोग से बदली दिग्ठान की 250 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक बावड़ी की सूरत
दिग्ठान/धार (मध्य प्रदेश): जिला प्रशासन द्वारा जनसहयोग से स्थानीय ऐतिहासिक विरासत और जल स्रोतों के संरक्षण की दिशा में एक अनूठी और प्रेरणादायक पहल देखने को मिली है। नालछा विकासखंड की ग्राम पंचायत दिग्ठान में आयोजित ‘मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान’ शिविर के समापन के तुरंत बाद, अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने मिलकर 250 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक बावड़ी के कायाकल्प के लिए सामूहिक श्रमदान किया।
🧹 दो घंटे चला गहन श्रमदान; उगाई झाड़ियां और कचरा साफ किया
ग्राम भ्रमण के दौरान पंचायत भवन के पास स्थित इस प्राचीन बावड़ी पर अधिकारियों की नजर पड़ी। यह बावड़ी लगभग 200 से 250 वर्ष पुरानी है, जिसके भीतर उत्कृष्ट स्थापत्य कला के दो सुंदर प्राचीन द्वार भी बने हुए हैं।
बावड़ी की जीर्ण-शीर्ण हालत और चारों तरफ उगी कंटीली झाड़ियों को देखकर जिला पंचायत सीईओ श्री अखिलेश कुमार जैन, जनपद सीईओ, स्थानीय जनपद सदस्यों, सरपंच व सचिव ने तुरंत मौके पर ही श्रमदान करने का फैसला लिया:
नया रास्ता तैयार: बावड़ी के अंदर जाने वाला मुख्य पुराना रास्ता बंद पड़ा था, जिसे श्रमदान कर तत्परता से नया रास्ता बनाकर खोला गया।
सफाई अभियान: लगभग दो घंटे तक चले इस अभियान में बावड़ी के चारों ओर जमा झाड़ियों, कचरे और गंदगी को पूरी तरह साफ किया गया।
आगे के निर्देश: जिला पंचायत सीईओ ने सरपंच व सचिव को बावड़ी के अंदरूनी दरवाजों और मुख्य हिस्से की मुकम्मल सफाई व नियमित रखरखाव के निर्देश दिए।
💧 जल संकट से निपटने के लिए प्राचीन बावड़ियों का पुनरुद्धार जरूरी
अल्प वर्षा की स्थिति को देखते हुए जिला पंचायत सीईओ श्री अखिलेश कुमार जैन ने समस्त ग्राम पंचायतों और नागरिकों से जल संरक्षण में आगे आने की अपील की। उन्होंने कहा कि:
भूजल स्तर में सुधार: प्राचीन कुओं और बावड़ियों का जीर्णोद्धार करने से भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार होगा और जल संकट से राहत मिलेगी।
विरासत का संरक्षण: इससे हमारी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरें सुरक्षित रहेंगी।
बहुउपयोगी जल: बावड़ियों के स्वच्छ जल का उपयोग पेयजल, पशुओं और सिंचाई के लिए किया जा सकेगा, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा।
👵 बुजुर्गों के चेहरे खिले, पुरानी यादें कीं साझा
बावड़ी की पुन: सफाई और निखरते स्वरूप को देखकर गांव के बुजुर्गों और ग्रामीणों के चेहरे खिल उठे। ग्रामीणों ने हर्ष जताते हुए अपनी पुरानी यादें साझा कीं और बताया कि वर्षों पहले उनके पूर्वज और वे स्वयं इसी बावड़ी का पानी पीने और स्नान के लिए उपयोग करते थे। वर्षों बाद इस ऐतिहासिक विरासत को मूल स्वरूप में लौटते देख ग्रामीणों ने इसके नियमित रखरखाव का संकल्प लिया।




































































































