लेखक: आनंद अग्निहोत्री
शब्द समागम मीडियाकर्मियों के लिए तीर्थ
शब्द समागम का सफर व जिले सहित आसपास जिले के पत्रकारों का साथ सच मानों तो इस आयोजन को गरिमा से पूर्ण बनाता है। पं. छोटू शास्त्री जी की शब्द समागम की परिकल्पना ने जो मजबूती मीडिया व कलम के स्वरूप को दी है उसे भुलाया नहीं जा सकता। 13 वर्ष पूर्व रखी गई इस आधारशिला ने प्रतिवर्ष अपने पथ पर एक अलग ही पहचान स्थापित की व जिले की लेखनी के मस्तक को हमेशा ऊँचा रखा। कार्यक्रमों के इन वर्षों में कई बड़े-बड़े पत्रकारों व प्रबुद्धजनों के अलग-अलग विचारों ने पत्रकारों को अपने कार्य के प्रति एक नई दिशा प्रदान की। हजारों पत्रकारों को इकट्ठा करना ही इस आयोजन का उद्देश्य नहीं रहा बल्कि जिले की मीडिया को एक सम्मान की दृष्टि से देखा जाए, सभी क्षेत्रों में मीडिया की एक अपनी श्रेष्ठ पहचान बने, मीडियाकर्मियों की सतह अपने क्षेत्र में मजबूत हो, यही सोच जिला पत्रकार संघ अध्यक्ष पं. छोटू शास्त्री ने आगे रख शब्द समागम की नींव रखी।
इन 13 वर्षों के अलग-अलग आयोजनों में शहरों से लेकर ग्रामीण अंचल तक के पत्रकारों को शामिल कर हर एक मीडियाकर्मी के प्रति पं. छोटू शास्त्री की समानदृष्टि ने सभी को प्रफुल्लित किया। आयोजन स्थल पर स्वागत की बेला में अपनी मुस्कुराहट रूपी पुष्प की पंखुड़ियों से स्वागत करती देखी गई। उसने छोटे-बड़े के भेद को कई दूर खड़ा कर आयोजन के उपरांत आपका यह बड़प्पन कि अधिक से अधिक पत्रकार मंच तक पहुँचकर सम्मान के साथ अपने स्वयं का … ऐसी अनुभूति रखे, आपके स्नेह का भाव आपके बड़प्पन को दर्शाता है।
वर्षों से होते आ रहे इस क्रम में नाश्ते व भोजन के अलग-अलग व्यंजनों की मिठास, अद्भुत यादों की स्मृतियों में शिरकत का अपना एक अंदाज शब्द समागम की महत्ता को बढ़ाता है। पत्रकारों के लिए लाखों रुपये की नि:शुल्क बीमा पॉलिसी की सोच दर्शाती है कि कलमकारों के प्रति ध्यान आकर्षण आयोजन की पहली सोच रही है। शब्द समागम का यह प्रासंगिक मीडियाकर्मियों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं। बड़ी जगह ऐसे आयोजन होना आम बात है लेकिन छोटी जगह ऐसे आयोजन की सोच मीडिया के पथ को ऊँचा करती है। शब्द समागम ने गाँव व शहर की मीडिया को समकक्ष खड़ा कर जो सम्मान दिया, वह विरले ही देखने को मिलता है। आज यह आयोजन 14 वर्षों के सफर को रेखांकित कर रहा है, जिससे लग रहा है कि जो आत्मीयता सभी पत्रकारों ने जिला पत्रकार संघ के प्रति रखी उसने कलम के मान-सम्मान को कभी कम नहीं होने दिया। आगे भी हमारे कदमों की आहट पीढ़ियाँ व शब्द समागम के प्रति ऐसे ही कदमताल कर इस पथ को सुशोभित करती रहेगी।
कदम-कदम पर कई रुकावट फिर भी चलते जाना है
सच की परछाई बन ही गए हो फिर कैसा घबराना है
कलम की महत्ता कम ना हो इस पथ को महकाना है
वर्षों तक जो याद रहे ऐसा कुछ कर जाना है…।




































































































