सेवा संकल्प अभियान (कहानी बदलाव की): बाग प्रिंट ने बदली सरमी दीदी की जिंदगी, दिहाड़ी मजदूरी छोड़ बनीं सफल उद्यमी; अब हर महीने ₹25 हजार की कमाई
धार (मध्य प्रदेश): सही मार्गदर्शन, कौशल प्रशिक्षण और अवसर जब मिलते हैं, तो ग्रामीण महिलाओं की मेहनत रंग जरूर लाती है। धार जिले के बाग विकासखंड अंतर्गत ग्राम आगर की रहने वाली श्रीमती सरमी दीदी की सफलता की कहानी इसी का एक सशक्त उदाहरण है। कभी बाग प्रिंट कारखाने में दैनिक मजदूरी (दिहाड़ी) करने वाली सरमी दीदी आज एक सफल उद्यमी बनकर प्रतिमाह 24 से 25 हजार रुपये की आय अर्जित कर रही हैं।
2017 में आजीविका मिशन से जुड़कर बदला जीवन
सरमी दीदी का जन्म एक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में हुआ था। सीमित संसाधनों के बावजूद उनके माता-पिता ने उन्हें कक्षा 12वीं तक शिक्षित किया। विवाह के बाद परिवार के भरण-पोषण के लिए वे एक कारखाने में दैनिक मजदूरी पर प्रिंटिंग का कार्य करने लगीं।
जीवन में असली बदलाव वर्ष 2017 में आया, जब वे राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के स्व-सहायता समूह (SHG) से जुड़ीं। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें न केवल वित्तीय मदद और ऋण मिला, बल्कि आजीविका मिशन द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से बाग प्रिंट को अपना व्यवसाय बनाने की प्रेरणा भी मिली।
कच्चे झोपड़े से शुरू हुआ सफर, अब पक्के वर्कशॉप में बन रहीं साड़ियां और सूट
आजीविका मिशन द्वारा दिए गए एक माह के विशेष प्रशिक्षण में सरमी दीदी ने बाग प्रिंट की बारीक तकनीकों, डिजाइन तैयार करने, कपड़ों की छपाई और उत्पाद निर्माण का व्यावहारिक ज्ञान हासिल किया।
शुरुआत: प्रशिक्षण के बाद उन्होंने अपने गांव में एक छोटे से कच्चे झोपड़े से काम शुरू किया।
उत्पाद: अपनी मेहनत और हुनर के दम पर उन्होंने बाग प्रिंट की साड़ियां, बेडशीट, सलवार-सूट और पर्दे तैयार करना शुरू किए।
वर्तमान स्थिति: आज संस्था के सहयोग से उन्हें एक पक्का कार्यस्थल (वर्कशॉप) उपलब्ध कराया गया है। वे और उनके पति मिलकर इस व्यवसाय को संचालित कर रहे हैं।
जिला से राष्ट्रीय स्तर तक पहचान (सरस मेले)
सरमी दीदी द्वारा तैयार बाग प्रिंट के उत्पादों की बिक्री आजीविका मिशन के माध्यम से आयोजित होने वाले जिला, राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर के आजीविका सरस मेलों में की जा रही है। स्टॉल के माध्यम से उनके उत्पादों को बड़ा बाजार मिला है, जिससे उनकी आय और व्यवसाय दोनों में तेजी से वृद्धि हुई है।
अब उनके परिवार को रोजगार की तलाश में पलायन नहीं करना पड़ता। उनके बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं और परिवार गांव में ही सम्मानजनक जीवन जी रहा है।
अन्य महिलाओं को प्रशिक्षण देकर बना रहीं आत्मनिर्भर
सरमी दीदी केवल खुद ही आत्मनिर्भर नहीं बनीं, बल्कि वे गांव की अन्य आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को भी बाग प्रिंट का मुफ्त प्रशिक्षण देकर रोजगार से जोड़ रही हैं।
वे स्व-सहायता समूह एवं ग्राम संगठन की अध्यक्ष होने के साथ-साथ संकुल स्तरीय आजीविका संगठन की कोषाध्यक्ष का दायित्व भी संभाल रही हैं। अपनी इस सफलता और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव एवं राज्य सरकार का आभार व्यक्त किया है।




































































































